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Jharkhand HC ka faisla talak ke upar

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*जहां विश्वास नहीं, वहां वैवाहिक संबंध असंभव: झारखंड हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला* झारखंड हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि जब पति-पत्नी के बीच विश्वास पूरी तरह समाप्त हो जाए, तो वैवाहिक संबंध को जबरन बनाए रखना उचित नहीं है। अदालत ने जमशेदपुर फैमिली कोर्ट के वर्ष 2024 के आदेश को निरस्त करते हुए पति को तलाक की अनुमति प्रदान कर दी। *मामले की पृष्ठभूमि* इस मामले में पति-पत्नी के बीच वैवाहिक जीवन में गंभीर मतभेद उत्पन्न हो चुके थे। पत्नी ने आरोप लगाया था कि बेटियों के जन्म के बाद उसके साथ मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना की गई। साथ ही पति के व्यवहार और पारिवारिक परिस्थितियों के कारण साथ रहना संभव नहीं रह गया था। *हाई कोर्ट का निर्णय* खंडपीठ ने कहा कि विवाह आपसी विश्वास, सम्मान और सहयोग पर आधारित संस्था है। यदि ये मूल तत्व समाप्त हो जाएं और संबंध केवल औपचारिकता बनकर रह जाए, तो उसे बनाए रखने का कोई औचित्य नहीं है। अदालत ने तलाक की अनुमति देते हुए 30 लाख रुपये स्थायी गुजारा भत्ता देने का निर्देश भी दिया, ताकि पत्नी का भविष्य सुरक्षित रह सके। *वैवाहिक संबंधों में विश्वास क...

बिना ट्रायल जेल में रखना सजा के समान: सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला”

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बिना मुकदमा चलाए जेल में रखना सजा के समान: सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि किसी व्यक्ति को लंबी अवधि तक बिना मुकदमा चलाए जेल में रखना अपने आप में सजा के बराबर है। यह फैसला न्यायिक प्रणाली में एक नए युग की शुरुआत का संकेत देता है, जहाँ व्यक्तिगत स्वतंत्रता और त्वरित न्याय को प्राथमिकता दी जाएगी। सुप्रीम कोर्ट का निर्णय सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों ने स्पष्ट किया कि आपराधिक न्याय प्रणाली का मुख्य उद्देश्य सजा देना नहीं है, बल्कि निष्पक्ष और समयबद्ध सुनवाई सुनिश्चित करना है। कोर्ट ने कहा कि यदि ट्रायल में अनावश्यक देरी हो रही है और आरोपी लंबे समय से न्यायिक हिरासत में है, तो उसकी जमानत पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। संविधान और व्यक्तिगत स्वतंत्रता भारतीय संविधान प्रत्येक व्यक्ति को त्वरित सुनवाई और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। यह अधिकार अनदेखा नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में जोर देकर कहा कि बिना मुकदमा चलाए जेल में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है, जो जीवन और व्यक्तिगत ...

यूपी बेसिक स्कूलों में समय विवाद: RTE नियमों का उल्लंघन और बच्चों के स्वास्थ्य पर संकट

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  UP बेसिक स्कूल टाइमिंग पर विवाद: RTE नियमों के खिलाफ गर्मियों में 6 घंटे संचालन पर उठी मांग उत्तर प्रदेश में बेसिक स्कूलों के संचालन समय पर विवाद गहरा गया है। RTE (निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा अधिकार) एक्ट के अनुसार, परिषदीय विद्यालयों का संचालन समय सर्दियों में 6 घंटे और गर्मियों में 5 घंटे होना चाहिए। लेकिन पिछले 3-4 सालों से विद्यालय गर्मियों में भी 6 घंटे खुल रहे हैं, जो RTE एक्ट का उल्लंघन है। *समस्या की जड़* 2015 तक, ग्रीष्म कालीन में संचालन समय प्रातः 07 बजे से दोपहर 12 बजे तक हुआ करता था। 2016 में इसे बदलकर प्रातः 08 बजे से अपरान्ह 01 बजे तक कर दिया गया। 2022 में, सचिव महोदय ने ग्रीष्मकालीन विद्यालयों का संचालन समय 1 घंटे अतिरिक्त बढ़ाकर अपरान्ह 02 बजे तक कर दिया, जो अभी तक चल रहा है। *RTE एक्ट का उल्लंघन* RTE एक्ट में स्पष्ट उल्लिखित है कि परिषदीय विद्यालयों का संचालन समय सर्दियों में 6 घंटे और गर्मियों में 5 घंटे रहेगा। लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने RTE एक्ट का उल्लंघन कर गर्मियों में बेसिक के स्कूल 6 घंटे खुलवाए जा रहे हैं। *नौनिहाल बच्चों के स्वास्थ्य की परवाह* यह म...

उत्तर प्रदेश में 31 मामलों में सीधे FIR पर रोक: हाईकोर्ट की टिप्पणी के बाद डीजीपी का नया निर्देश

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उत्तर प्रदेश में दहेज उत्पीड़न और चेक बाउंस समेत 31 मामलों में सीधे FIR नहीं होगी: डीजीपी का आदेश उत्तर प्रदेश के डीजीपी राजीव कृष्ण ने एक महत्वपूर्ण निर्देश जारी किया है, जिसके अनुसार दहेज उत्पीड़न, चेक बाउंस और 31 अन्य प्रकार के मामलों में पुलिस सीधे FIR दर्ज नहीं करेगी। यह निर्देश इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी के बाद आया है, जिसमें कहा गया था कि नियमों के विपरीत दर्ज की गई FIR से जांच प्रक्रिया प्रभावित होती है और आरोपी को अनुचित लाभ मिल सकता है। किन मामलों में FIR नहीं दर्ज होगी? डीजीपी के निर्देश के अनुसार, जिन 31 मामलों में FIR नहीं दर्ज होगी, उनमें शामिल हैं: - दहेज उत्पीड़न - चेक बाउंस - घरेलू हिंसा - भ्रूण हत्या - पशु अत्याचार - पर्यावरण और प्रदूषण संबंधी मामले - उपभोक्ता धोखाधड़ी - खाद्य मिलावट - अन्य 23 मामले जो कानून के तहत सीधे कोर्ट में शिकायत करने के लिए हैं पुलिस को क्या प्रक्रिया अपनानी होगी? पुलिस को पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि संबंधित मामले में न्यायालय संज्ञान ले सकता है या नहीं। यदि नहीं, तो परिवादी को मजिस्ट्रेट के समक्ष शिकायत दायर करनी होगी। पुलिस केवल उन...

जनहित याचिका के दुरुपयोग पर हाई कोर्ट सख्त: तथ्य छिपाने पर 20 हजार का जुर्माना” ⚖️

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जनहित याचिका का दुरुपयोग: ग्वालियर हाई कोर्ट का सख्त फैसला ग्वालियर में दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए, हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता ने अपने आपराधिक प्रकरणों की जानकारी छिपाकर पीआईएल दायर की थी, जिसे अदालत ने गंभीरता से लिया। इस मामले में, न्यायालय ने याचिकाकर्ता पर 20 हजार रुपये का जुर्माना लगाया और भविष्य में पारदर्शिता बरतने की सख्त टिप्पणी की। जनहित याचिका क्या है? जनहित याचिका (पीआईएल) एक ऐसा माध्यम है जिसके जरिए कोई भी व्यक्ति या संगठन सार्वजनिक हित के मामलों में न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है। इसका उद्देश्य समाज के वंचित और कमजोर वर्गों के अधिकारों की रक्षा करना और सार्वजनिक हित में न्याय सुनिश्चित करना है। कौन सी जानकारी देना अनिवार्य है? जनहित याचिका दायर करते समय, याचिकाकर्ता को अपने बारे में पूरी और सही जानकारी देना अनिवार्य है। इसमें उनके आपराधिक प्रकरणों की जानकारी भी शामिल है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि तथ्यों को छिपाकर न्यायालय का समय बर्बाद करना स्वीकार्य नहीं है। दोषी पाए जाने पर क्या होगा? इस मामले में...